व्यंग्य - खड़गेजी ने खोया आपा, हमें याद आए पापा!

 व्यंग्य - खड़गेजी ने खोया आपा, हमें याद आए पापा!

        (संजय एम तराणेकर)


राजनीति भी बड़ी कमाल की चीज है। नेताओं के मुँह से कोई शब्द निकल जाए, तो राष्ट्रीय बहस छिड़ जाती है। खड़गेजी के बयान में ‘बाप’ शब्द क्या आया, हमें अपने पापा याद आ गए।


हमारे पापा जब अम्मा से झगड़ते, तो अक्सर कहते, "तू क्या, तेरा बाप भी आएगा!" अम्मा तुरंत पलटवार करतीं, "हम तो तुम्हारी इज्जत करते हैं, तुमने हमारे बाबूजी का नाम कैसे लिया?" वहीं पापा का जवाब होता, "कान खोलकर सुन ले, एक नहीं, दस बार लूँगा!"


हम संदूक के पीछे दुबककर सोचते कि पापा ने नानाजी का नाम तो लिया ही नहीं, फिर अम्मा नाराज क्यों हैं? और कान खोलकर सुनने का मतलब क्या है? क्या कानों में भी दरवाजों की तरह कब्जे लगे होते हैं?


बड़े होकर समझ आया कि घर हो या राजनीति, जब तर्क कमजोर पड़ने लगते हैं, तो रिश्तेदारों को मैदान में उतार दिया जाता है। खड़गेजी के बयान में कोई ‘जाएगा’ तो हमारे पापा के संवाद में कोई ‘आएगा’। फर्क बस इतना है कि एक राष्ट्रीय स्तर पर बोलता है, दूसरा पारिवारिक स्तर पर। वहाँ प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, यहाँ रसोई के पास। वहाँ राजनीतिक गलियारों में हलचल मचती है, यहाँ घर के गलियारों में सन्नाटा छा जाता है।


वैसे हमारे पापा की राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं थी। अम्मा विपक्ष की नेता थीं और हम निर्दलीय सदस्य। मतदान करने की हमारी हैसियत नहीं थी, क्योंकि मतदान से पहले ही हमें संदूक के पीछे शरण लेनी पड़ती थी! घर में झगड़ा खत्म होने पर अम्मा-पापा एक ही थाली में खाना खा लेते थे, लेकिन राजनीति में बयानबाजी खत्म होने के बाद भी आरोप-प्रत्यारोप की थाली सजती रहती है।


सच तो यह है कि जब बहस में रिश्तेदारों को घसीटना पड़े, तो समझिए मुद्दे कमजोर और अहंकार मजबूत हो गया है। खड़गेजी का बयान सुनकर पापा की याद आई। फर्क इतना है कि तब हम संदूक के पीछे छिपते थे, आज लोग टीवी का चैनल बदल लेते हैं। जमाना बदल गया, मगर बहस में बाप को घसीटने की परंपरा आज भी कायम है!


संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)


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