रंग, रिवाज और बदलता गांव: राजिम अंचल में होली की तब और अब की तस्वीर राजिम-ग्रामीण अंचल

 रंग, रिवाज और बदलता गांव: राजिम अंचल में होली की तब और अब की तस्वीर
राजिम-ग्रामीण अंचल

 


 राजिम

फागुन की बयार के साथ ही राजिम और आसपास के गांवों में होली की आहट सुनाई देने लगी है। कभी चौपालों पर ढोलक की थाप, मंजीरे की झंकार और फाग गीतों की गूंज से सराबोर रहने वाला ग्रामीण परिवेश अब बदलती जीवनशैली और समयाभाव की चुनौतियों से जूझ रहा है। फिर भी रंगों का यह पर्व गांव की आत्मा में आज भी रचा-बसा है।
तब की होली: अपनापन, परंपरा और प्रकृति के रंग
कुछ दशक पहले तक गांवों में होली केवल रंग खेलने का दिन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का पर्व हुआ करता था। घर-घर से गुजिया, अंजीर पापड़ी और मालपुए की खुशबू आती थी। बच्चे कई दिन पहले से लकड़ी इकट्ठा कर होलिका दहन की तैयारी करते थे।
प्राकृतिक रंगों का चलन था—खासकर पलाश के फूलों से बनाया गया केसरिया रंग। खेत-खार और जंगलों में खिले पलाश के फूलों को उबालकर तैयार किया गया रंग त्वचा के लिए सुरक्षित और सुगंधित होता था।
गांव की चौपाल पर बुजुर्ग फाग गाते—
"फागुन आयो रे…"
और पूरा गांव एक परिवार की तरह झूम उठता।
अब की होली: बदलता दौर, बदलती तस्वीर
वर्तमान समय में तस्वीर कुछ बदली-बदली सी है। मोबाइल और सोशल मीडिया ने मेल-मिलाप की जगह ले ली है। रासायनिक रंगों और डीजे की तेज धुनों ने पारंपरिक फाग गीतों को पीछे धकेल दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि महंगाई और रोजगार की तलाश में युवाओं के पलायन ने भी त्योहार की रौनक को प्रभावित किया है। पहले जहां पूरा गांव एक साथ जुटता था, अब कई घरों में सादगी से होली मनाई जाती है।
कठिनाइयों के बीच त्योहार की उम्मीद
गांवों में जल संकट, आर्थिक तंगी और खेती-किसानी की चुनौतियों के कारण उत्सव की तैयारी पहले जैसी नहीं रह गई है। फिर भी लोग मानते हैं कि होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि रिश्तों को फिर से रंगने का अवसर है।
बुजुर्गों का कहना है कि यदि प्राकृतिक रंगों और परंपराओं की ओर लौटें, तो त्योहार की असली आत्मा फिर जीवंत हो सकती है।
पलाश: होली का प्राकृतिक प्रतीक
फागुन में जब खेतों के किनारे और जंगलों में पलाश के वृक्ष दहकते हैं, तो लगता है जैसे प्रकृति स्वयं होली खेल रही हो। पलाश को ‘वन की ज्वाला’ भी कहा जाता है। इसका गहरा केसरिया रंग प्रेम, उत्साह और नवजीवन का प्रतीक है।
राजिम अंचल के कई गांवों में आज भी महिलाएं पलाश के फूलों को सुखाकर रंग बनाती हैं, जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश देता है।
संदेश यही…
होली का असली अर्थ है—मन के मैल को धोना और रिश्तों में रंग भरना। बदलते समय में चुनौतियां जरूर हैं, पर यदि गांव अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, तो त्योहार की मिठास कभी कम नहीं होगी।
फागुन की इस बेला में राजिम अंचल के गांव फिर से रंगों में सराबोर होने को तैयार हैं—बस जरूरत है परंपरा और प्रकृति के रंगों को फिर से अपनाने की।

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