*गीता ज्ञान हिंसक युद्ध करने के लिए नहीं दिया गया था*

 *गीता ज्ञान हिंसक युद्ध करने के लिए नहीं दिया गया था*





आज परमात्मा के दिव्य जन्म और 'रथ' के स्वरूप को न जानने के कारण लोगों की यह मान्यता दृढ़ है कि गीता-ज्ञान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ में सवार होकर लड़ाई के मैदान में दिया। आप ही सोचिए कि जबकि अहिंसा को धर्म का परम लक्षण माना गया है और जबकि धर्मात्मा अथवा महात्मा लोग भी अहिंसा का पालन करते तथा अहिंसा की शिक्षा देते हैं तब क्या भगवान ने भला किसी हिंसक युद्ध के लिये किसी को शिक्षा दी होगी? जबकि लौकिक पिता भी अपने बच्चों को यह शिक्षा देता है कि परस्पर न लड़ो तो क्या सृष्टि के परमपिता, शान्ति के सागर परमात्मा ने मनुष्यों को परस्पर लड़ाया होगा! यह तो कदापि नहीं हो सकता। भगवान तो दैवी स्वभाव वाले सम्प्रदाय की तथा सर्वोत्तम धर्म की स्थापना के लिए ही गीता-ज्ञान देते हैं और उससे तो मनुष्य राग-द्वेष, हिंसा और क्रोध इत्यादि पर विजय प्राप्त करते हैं। अतः वास्तविकता यह है कि निराकार परमपिता परमात्मा शिव ने इस सृष्टि रूपी कर्मक्षेत्र अथवा कुरुक्षेत्र पर, प्रजापिता ब्रह्मा (अर्जुन) के शरीर रूपी रथ में सवार होकर माया अर्थात् विकारों ही से युद्ध करने की शिक्षा दी थी, परन्तु लेखक ने बाद में अलंकारिक भाषा में इसका वर्णन किया तथा चित्रकारों ने बाद में शरीर को रथ के रूप में अंकित करके प्रजापिता ब्रह्मा की आत्मा को भी उस रथ में एक मनुष्य (अर्जुन) के रूप में चित्रित किया। बाद में वास्तविक रहस्य प्रायः लुप्त अथवा गौण हो गया और स्थूल अर्थ ही प्रचलित हो गया।


संगम युग में भगवान् शिव ने जब प्रजापिता ब्रह्मा के तन रूपी रथ में अवतरित होकर ज्ञान दिया और धर्म की स्थापना की, तब उसके पश्चात् कलियुगी सृष्टि का महाविनाश हो गया और सतयुग स्थापन हुआ। अतः इस सर्व-महान् परिवर्तन के कारण बाद में यह वास्तविक रहस्य प्रायलुप्त हो गया। फिर जब द्वापर युग के भक्ति काल में गीता लिखी गयी तो बहुत पहले (संगम युग में) हो चुके इस वृतान्त का जो रूपान्तर व्यास ने वर्तमान काल (Present tense) का प्रयोग करके किया तो समयान्तर में गीता-ज्ञान को भी व्यास के जीवन काल में, अर्थात् द्वापर युग में दिया गया ज्ञान मान लिया। परन्तु इस भूल से संसार में बहुत बड़ी हानि हुई है क्योंकि यदि लोगों को यह रहस्य ठीक रीति से मालूम होता कि गीता-ज्ञान निराकार परमपिता परमात्मा शिव ने दिया था जो कि श्रीकृष्ण के भी परलौकिक पिता हैं और सभी धर्मों के अनुयायियों के परमपूज्य तथा सबके एक मात्र सद्गति-दाता तथा राज्य-भाग्य देने वाले हैं, तो सभी धर्मो के अनुयायी गीता का सर्वोत्तम शास्त्र मानते और उनके महावाक्यों को परमपिता के महावाक्य मानकर उनको शिरोधार्य करते और वे भारत ही संसार को ही अपना सर्वोत्तम तीर्थ मानते तथा शिव-जयन्ती को गीता-जयन्ती तथा गीता-जयन्ती को शिव जयन्ती के रूप में भी मानते । वे एक ज्योतिस्वरूप, निराकार परमपिता, परमात्मा शिव ही से योग-युक्त होकर पावन बन जाते तथा उससे सुख-शान्ति की पूर्ण विरासत ले लेते। परन्तु आज उपर्युक्त सर्वोत्तम रहस्यों को न जानने के कारण और गीता माता के पति सर्वमान्य निराकार परमात्मा शिव के स्थान पर गीता-पुत्र श्रीकृष्ण देवता का नाम लिख देने के कारण गीता का ही खण्डन गया है और संसार में घोर अनर्थ, हाहाकार तथा पापाचार हो गया है और लोग एक निराकार परमपिता की आज्ञा ('मन्मना भव' अर्थात्, एक मुझ ही को याद करो) को भूलकर व्यभिचारी बुद्धि वाले हो गये हैं !! आज फिर से उपर्युक्त रहस्य को जानकर परमपिता परमात्मा शिव से योग-युक्त होने से पुनः इस भारत में श्रीकृष्ण अथवा श्रीनारायण का सुखदायी स्वराज्य स्थापन हो सकता है और हो रहा है।

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